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सावन का महीना किसानों के लिए बहुत ही प्रिय महीना माना जाता है

हिंदुओं के हिसाब से सावन का महीना बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। क्योंकि यह हिंदुओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में रहने वाले हिंदुओं के द्वारा भी मनाया जाता है। इस महीने को हिंदू धर्म के हिसाब से बहुत ही शुभ माना जाता है। सावन के महीने में बहुत से त्योहार आते हैं, जो कि हिंदुओं के लिए बहुत ही खास और महत्वपूर्ण है। सावन के महीने में सबसे ज्यादा मंदिरों में भीड़ देखी जाती है। सावन का महीना बारिश का होता है और इन दिनों मौसम बहुत ही सुहावना और ठंडा रहता है। लोगों को इस मौसम में घूमने का बहुत ही मजा आता है। इस महीने को सावन का महीना इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस महीने में श्रवण नक्षत्र वाली पूर्णिमा आती है, इसीलिए इसे सावन का महीना कहा जाता है। यह महीना अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से जुलाई से अगस्त के महीने में आता है। इस महीने में भगवान शिव की पूजा की जाती है, जो कि बहुत ही शुभ मानी जाती है। कहा जाता है कि जो भी भगवान शिव से मांगता है, वही उसकी इच्छा पूरी होती है। इस महीने में हिंदुओं के द्वारा उपवास रखा जाता है। कई लोग पूरे सावन में एक समय ही भोजन करते हैं और भगवान शिव की भक्ति करते हैं। सावन के महीने में अधिकतर सावन के सोमवार का बहुत ही महत्व माना जाता है। सावन के महीने में कई जगहों पर मेले भी लगाए जाते हैं। सावन के महीने में प्रसिद्ध कावड़ यात्रा आयोजित की जाती हैं। सावन का महीना किसानों के लिए बहुत ही प्रिय महीना माना जाता है। सावन के महीने में हर तरफ हरियाली छा जाती है। धरती मानो स्वर्ग सी लगती है और बहुत ही सुंदर दिखाई देती है।

रक्तदान: महादान सबका रक्त: सबके लिए

रक्त रुधिर. . .ख़ून जी हाँ, लाल रंग का यह तरल ऊतक हमारा जीवन-आधार है। हालाँकि हमारे शरीर में इसकी मात्रा मात्र चार से पाँच लीटर ही होती है, फिर भी यह हमारे लिए बहुमूल्य है। इसके बिना हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। जीवन को चलाए रखने में यह कौन-कौन-सी भूमिका अदा करता है, इसकी लिस्ट तो लंबी-चौड़ी है फिर भी इसके कुछ मुख्य कार्य-कलापों पर दृष्टिपात करने पर ही इसके महत्व का पता चल जाता है। शरीर की लाखों-करोड़ों कोशिकाओं को आक्सीजन तथा पचा-पचाया भोजन पहुँचा कर यह उनके ऊर्जा-स्तर को बनाए रखने से लेकर भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी उठाता है। उन कोशिकाओं से कार्बन-डाई-ऑक्साइड तथा यूरिया जैसे विषैली गैसों एवं रसायनों को निकालने के कार्य में भी यह लगा रहता है। बीमारी पैदा करने वाले कीटाणुओं से तो यह लगातार लड़ता रहता है और उनके विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त एक अंग में निर्मित रसायनों, यथा हॉमोन्स को शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचाने से लेकर शरीर के ताप को एकसार बनाए रखने, आदि तमाम कार्यों में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है। इसकी संरचना में प्रयुक्त अवयवों के अनुपात में थोड़ा असंतुलन भी हमारे लिए तमाम परेशनियाँ खड़ी कर सकता है। यथा- सोडियम की ज़्यादा मात्रा रक्तचाप को बढ़ा देता है तो पानी की कमी हमें मौत के क़रीब पहुँचा सकती है और ऑयरन की कमी एनिमिक बना सकती है, आदि-आदि. . .। जब इतने से ही इतना कुछ हो सकता है तो ज़रा सोचिए, जब यह पूरा का पूरा हमारे शरीर से निकलने लगे तब क्या होगा? और दुर्भाग्य से हमारे साथ ऐसा होता ही रहता है।छोटी-मोटी चोटें तो हमारी दिनचर्या का हिस्सा है और इनसे निकलने वाले रक्त की कोई परवाह भी नहीं करता। कारण, हमारे शरीर में रक्त-निर्माण की प्रकिया शैने: शैने: सतत रूप से चलती ही रहती है। साथ ही रक्त में एक और गुण होता है और वह यह कि हवा के संपर्क में आते ही यह स्वत: जमने लगता है, जिसके कारण छोटे-मोटे घावों से निकलने वाला रक्त थोड़ी देर में स्वत: रुक जाता है। चिंता का विषय तब होता है जब हमें बड़ी एवं गंभीर चोट लगती है। ऐसी स्थिति में बड़ी रक्त-वाहिनियाँ भी चोटिल हो सकती हैं। इन वाहिनियों से निकलने वाले रक्त का वेग इतना ज़्यादा होता है कि रक्त के स्वत: जमाव की प्रक्रिया को पूरा होने का अवसर ही नहीं मिलता और एक साथ थोड़े ही समय में शरीर से रक्त की इतनी अधिक मात्रा निकल जाती है कि व्यक्ति का जीवन संकट में आ जाता है। यदि समय से उसे चिकित्सा-सुविधा न मिले तो मौत निश्चित है। चिकित्सकों का पहला प्रयास रहता है कि रक्त-प्रवाह को किस प्रकार रोका जाय और फिर यदि शरीर से रक्त की मात्रा आवश्यकता से अधिक निकल गई हो तो बाहर से किस प्रकार रक्त की आपूर्ति की जाए। बाहर से रक्त की आपूर्ति के संबंध में प्रयास एवं प्रयोग तो सत्रहवीं सदी से ही किए जा रहे थे। इन प्रयोगों में एक जानवर का रक्त दूसरे जानवर को प्रदान करने से ले कर जानवर का रक्त मनुष्य को प्रदान करने के प्रयास शामिल हैं। इनमें से अधिकांश प्रयोग असफल रहे तो कुछ संयोगवश आंशिक रूप से सफल भी रहे। 1885 में लैंड्यस ने अपने प्रयोंगों से यह दर्शाया कि जानवरों का रक्त मनुष्यों के लिए सर्वथा अनुचित है। कारण, मनुष्य के शरीर में जानवर के रक्त में पाए जाने वाली लाल रुधिर कणिकाओं के थक्के बन जाते है एवं ये थक्के रक्त वहिनियों को अवरुद्ध कर देते हैं जिससे मरीज़ मर सकता है। ऐसे प्रयोगों के फलस्वरूप, मनुष्य के लिए मनुष्य का रक्त ही सर्वथा उचित है, यह बात तो चिकित्सकों ने उन्नीसवीं सदी में ही समझ ली थी और एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर से रक्त प्राप्त कर ऐसे मरीज़ के शरीर में रक्त आपूर्ति की विधा भी विकसित कर ली गई थी एवं इसका उपयोग भी किया जा रहा था। लेकिन इसमें भी एक पेंच देखा गया- कभी तो इस प्रकार के रक्तदान के बाद मरीज़ बच जाते थे, तो कभी नहीं। 1905 में कार्ल लैंडस्टीनर ने अपने प्रयोगों द्वारा यह दर्शाया कि सारे मनुष्यों का रक्त सारे मनुष्यों के लिए उचित नहीं है। ऐसे प्रयासों में भी कभी-कभी मरीज़ के शरीर में दाता के रक्त की रुधिर कणिकाओं के थक्के उसी प्रकार बनते हैं जैसा लैंड्यस ने जानवरों के रक्त के बारे में दर्शाया था। 1909 में लैंडस्टीनर ने अथक प्रयास के बाद यह दर्शाया कि किस प्रकार के मनुष्य का रक्त किसे दिया जा सकता है। उन्होंने पाया कि हमारी लाल रुधिर कणिकाओं के बाहरी सतह पर विशेष प्रकार के शर्करा ऑलिगोसैक्राइड्स से निर्मित एंटीजेन्स पाए जाते हैं। ये एंटीजन्स दो प्रकार के होते हैं- ए एवं बी। जिन लोगों की रक्तकाणिकाओं पर केवल ए एंटीजेन पाया जाता है उनके रक्त को ए ग्रुप का नाम दिया गया। इसी प्रकार केवल बी एंटीजेन वाले रक्त को बी ग्रुप तथा जिनकी रुधिर कणिकाओं पर दोनों ही प्रकार के एंटीजेन पाए जाते हैं उनके रक्त को एबी ग्रुप एवं जिनकी रक्तकणिकाओं में ये दोनों एंटीजेन्स नहीं पाए जाते उनके रक्त को ओ ग्रुप का नाम दिया गया। सामान्यतया अपने ग्रुप अथवा ओ ग्रुप वाले व्यक्ति से मिलने वाले रक्त से मरीज़ को कोई समस्या नहीं होती, लेकिन जब किसी मरीज़ को किसी अन्य ग्रुप के व्यक्ति (ए,बी या फिर एबी) रक्त दिया जाता है तो मरीज़ के शरीर में दाता के रक्त की लाल रुधिर कणिकाओं के थक्के बनने लगते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि ए का रक्त बी, एबी एवं ओ में से किसी को नहीं दिया जा सकता; बी का रक्त ए, एबी एवं ओ को नहीं दिया जा सकता और एबी का रक्त तो किसी को नहीं दिया जा सकता। परंतु एबी (युनिवर्सल रिसीपिएंट) को किसी भी ग्रुप का रक्त दिया जा सकता है तथा ओ (युनिवर्सल डोनर) किसी को भी रक्त दे सकता है। ऐसा क्यों होता है? इसे पता लगाने के प्रयास में यह पाया गया कि किसी भी व्यक्ति के रक्त के तरल भाग प्लाज़्मा में एक अन्य रसायन एंटीबॉडी पाया जाता है। यह रसायन उस व्यक्ति की लाल रुधिर काणिकाओं के उलट होता है। ए ग्रुप में बी एंटीबॉडी मिलता है तो बी में ए एवं ओ में दोनों एंटीबॉडीज़ मिलते हैं। परंतु एबी में ऐसे किसी भी एंटीबॉडीज़ का अभाव होता है। एक ही प्रकार के एंटीजेन एवं एंटीबॉडी के बीच होने वाली प्रतिक्रिया के फलस्वरूप रुधिर कणिकाएँ आपस में चिपकने लगती हैं, जिससे इनका थक्का बनने लगता है। यही कारण है कि जब ए का रक्त बी को दिया जाता है मरीज के रक्त में उपस्थित एंटीबॉडी ए दाता के लाल रुधिर कणिकाओं पर पाए जाने एंटीबॉडी ए से प्रतिक्रिया कर उनका थक्का बनाने लगते हैं। यही बात तब भी होती है जब बी का रक्त ए को दिया जाता है। चूँकि ओ में दोनों ही एंटीबॉडीज़ मिलते हैं अत: ऐसे मरीज़ को ए,बी अथवा एबी, किसी का रक्त दिए जाने पर उसमें पाए जाने वाली रुधिर कणिकाओं का थक्का बनना स्वाभाविक है। इसके उलट, एबी में कोई भी एंटीबाडी नहीं होता अत: इसे किसी भी ग्रुप का रक्त दिया जाय थक्का नहीं बनेगा। रक्तदान के पूर्व दाता एवं मरीज़ दोनों के रक्त का ग्रुप पता करने की विधा भी खोज निकाली गई। कार्ल लैंडस्टीनर की इस खोज ने ब्लड ट्रांसफ्युज़न के फलस्वरूप मरीज़ों को होने वाली परेशानियों एवं इनकी मृत्युदर में भारी कमी ला दी। चिकित्सा जगत के लिए यह खोज इतनी महत्वपूर्ण थी कि 1930 में लैंडस्टीनर को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बाद में आरएच फैक्टर एवं एम तथा एन जैसे एंटीजेन तथा ब्लड ग्रुप की खोज में भी इन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। कुछ समस्याएँ तो इन सब के बाद भी बनी रहीं ओर भी बनी हुई हैं। यथा, आकस्मिक दुर्घटना के कारण अचानक आवश्यकता से अधिक रक्त की हानि होने पर मरीज़ की जान बचाने के लिए तुरंत रक्त की आवश्यकता पड़ती है और वह भी उस ग्रुप की जो उसके लिए उचित हो। यदि समय रहते सही रक्तदाता न मिले तो समस्या गंभीर हो सकती है। सामूहिक दुर्घटना की स्थिति में तो बहुत सारे रक्त की, वह भी अलग-अलग ग्रुप वाले रक्त की आवश्यकात पड़ सकती है। इस समस्या से निपटने के लिए ब्लड बैंक की स्थापना का विचार आया। यह तभी संभव हो पाया जब 1910 में लोगों की समझ में यह बात आई कि रक्त को जमने से रोकने वाले रसायन एंटीकोआगुलेंट को रक्त में मिला कर उसे कम ताप पर रेफ्रिज़िरेटर में कुछ दिनों के लिए रखा जा सकता है। 27 मार्च 1914 में एल्बर्ट हस्टिन नामक बेल्जियन डॉक्टर ने पहली बार दाता के शरीर से पहले से निकाले रक्त में सोडियम साइट्रेट नामक एंटीकोआगुलेंट को मिला कर मरीज़ के शरीर में ट्रांसफ्यूज़ किया। लेकिन पहला ब्लड बैंक 1 जनवरी 1916 में ऑस्वाल्ड होप राबर्ट्सन द्वारा स्थापित किया गया। इस सबके बावजूद संसार में मरीज़ों की जान बचाने के लिए रक्त का अभाव बना ही रहता है। वैज्ञानिक निरंतर इस प्रयास में लगे रहते हैं कि किस प्रकार इस समस्या से निपटा जाय। साथ ही यह भी प्रयास रहा है कि किस प्रकार लाल रुधिर कणिकाओं पर पाए जाने वाले एंटीजेंस से छुटकारा मिल सके ताकि किसी का रक्त किसी को भी दिया जा सके। १९६० के बाद इस प्रयास में काफी तेजी आई है। डेक्सट्रान जैसे संश्लेषित प्लाज़्मा सब्सटीच्यूट द्वारा रक्त का परिमाण तो बढ़ाया जा सकता है लेकिन शरीर की कोशिकाओं को रक्त पहुँचाने वाले लाल रुधिर काणिकाओं का क्या सब्स्टीच्यूट है? 1970 के दशक में जापान के वैज्ञानिकों ने फ्लूओसॉल-डीए जैसे रसायन का आविष्कार किया जो कोशिकाओं को अस्थायी तौर पर ऑक्सीजन पहुँचाने का काम कर सकते हैं। 1980 के दशक में वैज्ञानिकों को एक ब्लड ग्रुप को दूसरे में परिवर्तित करने में आंशिक सफलता मिली थी। इसी की अगली कड़ी है- युनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगेन के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों के दल ने एक ऐसी तकनीक़ का विकास किया है जिसके द्वारा किसी भी ग्रुप के आरएच निगेटिव रक्त को, चाहे वह ए ग्रुप का हो या बी का अथवा एबी का, ओ ग्रुप में परिवर्तित किया जा सकता है। यदि आपने यह आलेख ध्यान से पढ़ा है तो आप जानते ही हैं कि ओ ग्रुप का रक्त किसी को भी दिया जा सकता है। यह एक क्रांतिकारी अनुसंधान है। 1 अप्रैल 2007 के नेचर बॉयोटेक्नॉलॉजी के अंक में प्रकाशित आलेख के अनुसार लगभग 2500 बैक्टीरिया एवं फफूंदियो की प्रजातियों के जांच-पड़ताल के बाद इन वैज्ञानिकों को एलिज़ाबेथकिंगिया मेनिंज़ोसेप्टिकम एवं बैक्टीरियोऑएड्स फ्रैज़ाइलिस में पाए जाने वाले सक्षम ग्लाइकोसाइडेज़ एन्ज़ाइम्स की खोज में सफलता मिली है जो लाल रुधिर कणिकाओं की सतह से संलग्न ऑलिगोसैक्राइड्स (एंटीजेन ए अथवा बी) को बड़ी सफ़ाई से काट कर अलग कर सकते हैं और वह भी तटस्थ पीएच पर। इन एन्ज़ाइम्स की क्रियाशीलता केवल ए तथा बी एंटीजन्स तक ही सीमित है। ये आरएच एंटीजेन के विरूद्ध अप्रभावी हैं, फलत: इनके द्वारा केवल आरएच निगेटिव रक्त को ही ओ ग्रुप में बदला जा सकता है। यह सीमित सफलता भी बड़ी महत्वपूर्ण है। इसके द्वारा भी बहुतेरे मरीज़ों की जान बचाई जा सकेगी। हालांकि इस विधा का क्लीनिकल ट्रायल अभी शेष है। आशा है, जल्दी ही इसे भी पूरा कर लिया जाएगा एवं इसका लाभ शीघ्र ही मरीज़ों को मिलने लगे

विश्व रक्तदाता दिवस

विश्व रक्तदाता दिवस का उद्देश्य दुनिया भर में जरूरतमंद लोगों को रक्त और रक्त उत्पादों की आपूर्ति करना है। यह अभियान प्रतिवर्ष लाखों लोगों की जान बचाता है और रक्त प्राप्तकर्ता के चेहरे पर मुस्कान लाता है। रक्त आधान कई जानलेवा बीमारियों से पीड़ित रोगियों की मदद करता है और उन्हें बेहतर जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है

विश्व रक्तदाता दिवस

विश्व स्वास्थ्य संगठन विश्व के देशों के स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं पर आपसी सहयोग एवं मानव को स्वास्थ्य सम्बन्धी समझ विकसित कराने की संस्था है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के 194 सदस्य देश तथा दो संबद्ध सदस्य हैं। यह संयुक्त राष्ट्र संघ की एक अनुषांगिक इकाई है। इस संस्था की स्थापना 7 अप्रैल 1948 को की गयी थी। इसका उद्देश्य संसार के लोगो के स्वास्थ्य का स्तर ऊँचा करना है। डब्‍ल्‍यूएचओ का मुख्यालय स्विट्ज़रलैण्ड के जिनेवा शहर में स्थित है। इथियोपिया के डॉक्टर टैड्रोस ऐडरेनॉम ग़ैबरेयेसस विश्व स्वास्थ्य संगठन के नए महानिदेशक निर्वाचित हुए हैं।

ईद मुबारक!

ईद-उल-अजहा की आपको भी दिल की गहराइयों से मुबारकबाद! अल्लाह आपकी कुर्बानियों को कबूल करे और आपके परिवार में सुख, शांति और बरकत बनाए रखे। ईद मुबारक!

साइबर अपराध से खुद को बचाने के तरीके साइबर हमलों से सुरक्षा

साइबर अपराध से खुद को बचाने के तरीके साइबर हमलों से सुरक्षा का उपयोग करता है। आप इन ईमेल भारी वित्तीय नुकसान हो सकता है। और संदेशों से धोखा खा सकते हैं जिससे संभावित पहचान की धमकी या अपनी सोशल मीडिया सेटिंग प्रबंधित करें जब आप अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल पर काम कर रहे हों. तो सबसे अच्छी सलाह यह है कि अपनी व्यक्तिगत या निजी जानकारी को लोगों की नज़रों से दूर रखें। आम तौर पर, सोशल इंजीनियरिंग साइबर अपराधी सिस्टम को हैक करने और आपकी व्यक्तिगत जानकारी प्राप्त करने के लिए ऐसे ही पलों का इंतज़ार कर रहे होते हैं। सही साइबर बीमा पॉलिसी प्राप्त करें सूची में सबसे बढ़िया सुझाव जोड़ते हुए अपने व्यवसाय या संगठन को साइबर जोखिमों या संभावित साइबर हमलों से सुरक्षित रखने के लिए साइबर बीमा खरीदें। खतरे आपके सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल में प्रवेश कर सकते हैं और संभावित रूप से पूरे सिस्टम को दूषित कर सकते हैं हैं। या संवेदनशील डेटा चुरा सकते हैं। अपने ब्राउज़र में पासवर्ड सेव करने की इच्छा से बचें अपने व्यवसाय को सुरक्षित रखने के लिए, आपको अपने ब्राउज़र में पासवर्ड संग्रहीत करने की आदत से बचना होगा। ब्राउज़र में संग्रहीत पासवर्ड हैकर्स के लिए लॉगिन गिन को आसान बनाते हैं। फिर भी, उन्हें चुराना और आपके सिस्टम में प्रवेश करना आसान है। चुराए गए पासवर्ड आपके व्यवसाय के आईटी नेटवर्क तक पहुँचने की कुंजी के रूप में कार्य करते हैं और सुचारू कामकाज में बाधा डालते हैं। अपने संगठन के लिए ब्राउजर-आधारित पासवर्ड पर निर्भर र्भर रहने के बजाय, आप ब्राउज़र और वेब आधारित अनुप्रयोगों के लिए क्रेडेंशियल प्रबंधित करने के लिए प्रबंधन टूल का उपयोग कर सकते हैं। इसके अलावा, कर्मचारी आईटी टीम की अनुमति से इस टूल तक पहुँच सकते हैं। इस तरह से आईटी टीम केंद्रीय दृश्यता और नियंत्रण बनाए रख सकती है जबकि हर कोई इस पर काम कर रहा है। इंटरनेट पर मौजूद हर चीज़ पर भरोसा न करें हां, हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां एक तिहाई आबादी हर दिन दुर्भावनापूर्ण लिंक पर क्लिक करती है। हालांकि, इंटरनेट पर दिखाई देने वाले संदिग्ध लिंक पर कभी भी क्लिक न करें जो आपके सिस्टम के कामकाज से समझौता कर सकते हैं। अपने बच्चों से इंटरनेट के बारे में बात करें अपने बच्चों को इंटरनेट के स्वीकार्य उपयोग के बारे में सिखाएँ और सुनिश्चित करें कि अगर उन्हें ऑनलाइन उत्पीड़न, पीछा करने या धमकाने का सामना करना पड़ता है, तो वे आपके पास आने में सहज महसूस करें। इसके अतिरिक्त, उन्हें पहचान की चोरी से बचाएँ, क्योंकि बच्चों को अक्सर उनके साफ-सुथरे क्रेडिट इतिहास के लिए निशाना बनाया जाता है। अपनी व्यक्तिगत जानकारी साझा करते समय सावधान रहें और उन संकेतों के प्रति सतर्क रहें जिनसे उनकी पहचान से समझौता हो सकता है। यदि आप शिकार बन जाएं तो क्या करें? भारत में साइबर अपराध का सामना करने के बाद, घटना के सभी विवरणों को दस्तावेजित करके तत्काल कार्रवाई करना महत्वपूर्ण है, जिसमें स्क्रीनशॉट या ईमेल जैसे सबूत शामिल हैं। सबसे पहले, किसी भी पुलिस स्टेशन में या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के माध्यम से प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करें। विशेष सहायता के लिए निकटतम साइबर अपराध सेल से संपर्क करें। खातों को सुरक्षित रखने और धोखाधड़ी की निगरानी करने के लिए बैंकों, क्रेडिट ब्यूरो और सेवा प्रदाताओं जैसे प्रासंगिक संगठनों को सूचित करें। साइबर कानूनों के तहत अपने विकल्पों को समझने के लिए हैक किए गए खातों के पासवर्ड बदले और कानूनी सलाह पर विचार करें। भविष्य की घटनाओं को रोकने के लिए सॉफ्टवेयर को नियमित रूप से अपडेट करें, विश्वसनीय सुर सुरक्षा सॉफ्टवेयर का उपयोग करें और खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित ऑनलाइन प्रथाओं के बारे में शिक्षित करें।

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सदस्य बनें हमारे मुख्य उद्देश्य अपराध एवं अपराधियों से समाज को मुक्त कराना। नागरिको को कानूनी अधिकार एवं उचित न्याया दिलवाना । गरीब व अहसाय लोगो की मदद करना। पर्यावरण प्रदुषण को रोकना। महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों पर रोक लगवाना। खाद्य पार्दथों मे मिलवाटखोरो पर अंकुश लगवाना। लोगो को मानव अधिकारो के बारे मे जागरूक करना। समाज में व्याप्त श्रमिक शोषण रोकना। यातायात नियमों का पालन करना व लोगो को समझाना। राष्ट्रहित व जनहित मे कार्य करना व करवाना। नाशाखोरी को समाज से खत्म करने में मदद करना। HELP LINE NO. +91-9411979787

“माननीय सहयोगीगण आपका योगदान एक थाली भोजन में बदलकर

“माननीय सहयोगीगण आपका योगदान एक थाली भोजन में बदलकर किसी ज़रूरतमंद तक पहुँचेगा।, तेज़ी से आगे बढ़ते शहरी जीवन में हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि हमारे आसपास आज भी ऐसे लोग हैं जिनके लिए एक समय का भोजन अब भी एक चुनौती है। भोजन भंडारा वितरण हमारे ट्रस्ट की एक ऐसी सामाजिक पहल है जो सीधे मानव गरिमा और मूलभूत आवश्यकता से जुड़ी हुई है। हम मानते हैं कि भूख न धर्म देखती है, न जाति, न सामाजिक स्थिति। भूखा व्यक्ति केवल एक इंसान होता है, और उसे सम्मानपूर्वक भोजन उपलब्ध कराना सच्ची सामाजिक जिम्मेदारी है। इसी सोच के साथ हमारा ट्रस्ट धार्मिक आयोजनों, सामाजिक कार्यक्रमों और ज़रूरतमंद क्षेत्रों में नियमित रूप से भोजन वितरण करता है। दानदाताओं का सहयोग इस पहल को अधिक प्रभावशाली, अधिक संगठित और अधिक लोगों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आपका सहयोग ✔ प्रत्यक्ष रूप से भोजन वितरण में उपयोग होगा ✔ पूर्णतः पारदर्शी एवं सेवा-केंद्रित रहेगा ✔ समाज में आपकी सकारात्मक सामाजिक भूमिका को सुदृढ़ करेगा यह सहयोग आपकी CSR प्रतिबद्धताओं और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना दोनों को सार्थक रूप देता है। आइए, हम सब मिलकर सामाजिक विकास की इस यात्रा में भागीदार बनें और सुनिश्चित करें कि कोई भी भूखा न रहे। आपका योगदान — किसी के लिए भोजन, किसी के लिए आशा, और समाज के लिए सकारात्मक बदलाव बने। सादर, — ट्रस्ट परिवार”